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श्रावण-भादौ मास की सांझ महाकाल लोक में बनी कला और आस्था का संगम: पाँचवीं संध्या भरतनाट्यम, तबला त्रिवेणी और शिव अष्टकम की दिव्य छटा, श्रद्धालु हुए भावविभोर!
उज्जैन लाइव, उज्जैन, श्रुति घुरैया:
श्रावण-भादौ मास के पावन अवसर पर श्री महाकाल महालोक परिसर में आयोजित सांस्कृतिक संध्या का वातावरण भक्तिमय, कलामय और अत्यंत भावविभोर कर देने वाला रहा। इस दिव्य श्रृंखला की पाँचवीं संध्या में देश की समृद्ध शास्त्रीय परंपराओं और आध्यात्मिक भावनाओं का अद्भुत संगम देखने को मिला। प्रतिदिन संध्या 6 बजे से रात्रि 8 बजे तक चलने वाला यह आयोजन श्रद्धालुओं और दर्शकों के लिए आध्यात्मिक आनंद और सांस्कृतिक गौरव का साक्षात मंच बन गया है।
कार्यक्रम का शुभारंभ महाकाल मंदिर के पुजारी राम शर्मा और कथावाचक पंडित सुलभ शान्तु गुरु शर्मा द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ, जो सांस्कृतिक प्रकाश और अध्यात्म का प्रतीक रहा। आयोजन में मंदिर समिति के उप प्रशासक एसएन सोनी और सिम्मी यादव ने कलाकारों को सम्मानित करते हुए उन्हें दुपट्टा, प्रसाद और स्मृति चिन्ह भेंट किए। इस संपूर्ण आयोजन का सुचारु संचालन वरिष्ठ मंच संचालक सुदर्शन अयाचित ने किया, जिनकी वाणी में भक्ति, कला और संस्कृति का त्रिवेणी संगम स्पष्ट दिखाई दिया।
इसके बाद अद्भुत “तबला त्रिवेणी” से हुई, जिसमें तीन कलाकारों—अरुण कुशवाह, वैभव भावसार और हर्ष यादव—ने तीनताल की 16 मात्राओं में विलंबित लय की प्रस्तुति दी। पेशकार, कायदे-पालटे और मध्यलय में रौ, रेला और चलन की लयकारी ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम का समापन फरमाइशी चक्करदार परण के साथ हुआ, जो ताल और लय के अनुशासन में बसी भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा को दर्शाता है।
इसके बाद भरतनाट्यम की मनोहारी प्रस्तुतियाँ हुईं। गर्गी आचार्य ने गणेश स्तुति “गाइए गणपति जगवंदन” पर अपनी भाव-भंगिमा और ताल-लय से सभी को भावविभोर कर दिया। राग हंस ध्वनि में अदिति जोशी द्वारा प्रस्तुत नटेश कौतुवम में भगवान शिव की विविध मुद्राओं का अत्यंत प्रभावशाली प्रदर्शन किया गया, जिसमें शिव के तांडव और सौम्य रूपों का अद्भुत संतुलन दर्शाया गया। राधा-कृष्ण संवाद की प्रस्तुति ने दर्शकों को ब्रज की भक्ति रसधारा में बहा दिया, वहीं रुद्राष्टकम के गूढ़ भावों ने आत्मा को शिवमय कर दिया।
कार्यक्रम का समापन आदि शंकराचार्य रचित अर्धनारीश्वर अष्टकम से हुआ, जिसमें शिव और शक्ति के समन्वय स्वरूप को नृत्य के माध्यम से जीवंत कर दिखाया गया। यह प्रस्तुति नारी और पुरुष तत्व के संतुलन, सृजन और संहार के शाश्वत सिद्धांत को अभिव्यक्त करती है। इस संगीतमय और नृत्यमय आराधना में बड़ी संख्या में दर्शक उपस्थित रहे और हर प्रस्तुति पर तालियों से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।